One Step Recipe for a Happy Life

Everyone wants to live a happy and successful life. But still some people struggle to get there. I often come across two types of strugglers –

  • Those who do not have a goal and keep struggling in random directions
  • Those who have a strong goal and they refuse to be happy unless they reach the goal.

These are two recipes for a miserable life. One must have a goal. Goals define our success. A journey without a goal is a meaningless wandering in the woods. But life is not just the goal. Life is what happens on our way to the goal. If we loathe each moment of our journey, then we will be left with few moments of celebrations when achieve the goal.

This attitude of “over obsession” with goals leads to frustrations. It is like planting a tree for reaping the fruits. It’s a good intention but if we are only waiting for the tree to grow and bear fruits, each day of tending to the tree – watering, weeding, pruning everything will be a burdensome task. Instead, if we enjoy each day of caring for the tree, right from the sapling stage, we would have a journey full of happiness. Seeing each new leaf spring up to life, new branches taking shape, changing colours of the leaves, the flowers before they turn into fruits, the butterflies hopping on the flowers- each moment is filled with thrill and joy. Shall we miss it? If we miss, we limit ourselves to one single moment of joy when we finally pluck the fruit. Why not add all these moments and have a much fuller, much happier, much more successful life.

Every spectacular success is preceded by an unspectacular preparation. Majority of our lives will be spent in those – so-called unspectacular preparation stage. Hating these days will reduce our efforts. We can’t give our 100% to something we do not love. The only thing that is in our control is – putting in the effort. If we can do it wholeheartedly and happily, we will do it much better. The results are based on our inputs. Let’s love that process, let’s be happy about it, let’s love the journey – that will add much more happiness to our lives than just waiting for the final goal to be achieved. “ Karmanya wadhikarste ma phaleshu kadachan” कर्मण्यावाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन – says Gita. Only thing that is in our hands, is to put in the efforts, we need not worry about the goal. That is the recipe for a happy life lived to its fullest.

  • Nupur Jaiswal
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बच्चा और टीचर

आज क्लास में टीचर ने पढ़ाया है –

हिन्दुओं का धर्मग्रन्थ गीता है ,

मुस्लिमों का कुरान है ,

और ईसाइयों का बाइबल .

ये मंदिर जाते हैं ,

वे मस्जिद ,

और वे गिरजा .

बच्चा जान गया है

कि सब अलग – अलग हैं .

वह गहरी सोच में है .

इतने दिनों से पता ही नहीं चला कि

क्या अलग है ?

वह गहरी सोच में है

उसे अब भी नहीं पता कि

क्या अलग है ?

हाथ – पैर , आँख – कान एक ही जैसे हैं ,

कल खेल में जब घुटने छिल गए थे

तो तीनों के अन्दर से

लाल खून ही छलका था .

बच्चा गहरी सोच में है .

टीचर अगला पाठ पढ़ा रही है –

ये भारत ,

ये पाकिस्तान .

ये चीन .

ये बर्मा .

बच्चे को नक़्शे रटने हैं .

बच्चा गहरी सोच में है –

आखिर ये टेढ़ी – मेढ़ी लकीरें बनाईं  किसने ?

इंसान ने ?

पर टीचर तो कहती है कि

वे सब अलग – अलग हैं .

भगवान् ने ?

पर टीचर तो कहती है कि

वे भी अलग – अलग हैं .

बच्चा परेशान है .

टीचर उसे सवाल नहीं पूछने देती .

खुद ही सवाल बनाती है

खुद जवाब बताती है ,

बच्चे को बस रटना है .

बच्चा परेशान है ,

वह गहरी सोच में है .

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ज़िंदगी

ज़्यादा मत बोल ,

दाँत दिखा कर मत हँस ,

दिन भर ऊधम मत कर ,

ये ले , भाई को पकड़ ,

ये कलछुल पकड़ ,

सुई धागा पकड़ –

कल पराये घर जायेगी .

खाना बना ,

घर सजा ,

सज कर रह ,

दब कर रह ,

पति को लुभा ,

सास को सुहा ,

घर की इज्ज़त तेरे हाथ में है .

बहती नाक पोंछ ,

गीले पोतड़े बदल ,

कदम धरना सिखा ,

सही बोलना सिखा ,

दूध पानी दे ,

कोई कहानी दे ,

बच्चे पालना खेल है क्या ?

सुबह उठा ,

टिफिन पकड़ा ,

बस पकड़ा ,

शाम को पढ़ा ,

होमवर्क करा ,

दुनिया दिखा ,

कायदा सिखा ,

इनका भविष्य तेरे हाथ में है .

सफ़ेद बाल ,

दुखती कमर ,

जोड़ों का दर्द ,

उंगलियाँ सर्द ,

मौत अब निकट ,

लगता नहीं डर?

डर ?

ज़िंदगी ख़त्म होने का डर ?

ज़िंदगी मेरी शुरू हुई कहाँ ?

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इस क्षण का हम क्या करें

graficiपल –पल जुड़कर हमारी ज़िंदगी बनाती है . इन पलों में कई बार हमारे सामने कुछ आनंदपूर्ण क्षण आते हैं . और उसके साथ ही आती है एक असमंजस की स्थिति .

एक क्षण जो हमारे सामने आता है उसका हम क्या करें ? उसका आनंद उठाएँ या उसे बाँध कर अपने पास रख लेने का प्रयास करें ? चाहे वह कोई मनोरम दृश्य हो या फिर कोई अनोखा क्षण , किसी से मुलाक़ात के पल हों या किसी कार्यक्रम की प्रस्तुति – हम उस क्षण में डूबने और उसका आनंद लेने की बजाय, उसे कैद करने में जुट जाते हैं – अपने फोन के कैमरे में . अधिकतर मैं देखती हूँ कि मंच पर कोई कार्यक्रम चल रहा होता है और लोगों की निगाह मंच पर नहीं बल्कि अपने फोन पर होती है जिस के परदे पर वे उसे रिकार्ड कर रहे होते हैं . मुझे उस वक़्त उन लोगों से पूछने का दिल करता है कि आपका इस कार्यक्रम में आने का मकसद क्या था भई ? इस कार्यक्रम का आनंद लेने का या फिर उसे अपने कैमरे में क़ैद करने का ? शायद यह मनुष्य की अमरत्व प्राप्ति की इच्छा का प्रतीक है . उस पल को क़ैद कर वह उसे अमर बना देना चाहता है ताकि वह बीत न जाए . ताकि वह उसकी मुट्ठी में क़ैद रहे और वह जब चाहे अपने मुट्ठी खोल कर उस पल को दुबारा देखा सके.

मज़े की बात ये है कि कैमरे में क़ैद की गयी उस तस्वीर या वीडियो को कोई दुबारा शायद ही देखता हो . उस का मक़सद सिर्फ उसे सोशल मीडिया पर शेयर करना होता है – देखो मैंने इस को देखा . पर देखा कहां ? आपने तो सिर्फ उसे क़ैद किया . मुझे लगता है इसके पीछे मनुष्य की दो प्रवृत्तियाँ झलकती हैं – एक यश लिप्सा और दूसरी अधिग्रहण की आतुरता . चाहे वह एक सुन्दर सा फूल हो या कोई अन्य वस्तु , जैसे ही कोई चीज़ हमें अच्छी लगती है हमारे अन्दर उसे अपने पास रख लेने की एक अदम्य इच्छा जाग उठती है . इसी प्रकार ,हमारी एक और प्रवृत्ति है – अपनी तुच्छ से तुच्छ उपलब्धि को सारी दुनिया के सामने उजागर करने की प्रबल अभिलाषा .

शायद इसी कारण हम हर मनोरम पल को अपने कैमरे में क़ैद कर लेना चाहते हैं , उसे अमर बना देना चाहते हैं और फिर सारी दुनिया के सामने उस उपलब्धि का प्रदर्शन करने को आतुर रहते हैं . देखा जाये तो यह कोइ बुरी बात नहीं है परन्तु सोचने वाली बात यह है कि आनंद किसमें है – उस पल में मग्न हो जाने में उसमें भावविभोर हो जाने में या फिर उसे कैद कर अपने उपलब्धियों का बखान करने में .

आप क्या करेंगे यह आप पर निर्भर है . आप चाहे तो ज़िंदगी के हर मनोरम पल का भरपूर आनंद उठा सकते हैं या फिर उसे कैद कर उपलब्धि प्रदर्शन कर गौरवान्वित हो सकते है.  आप क्या करेंगे चुनाव आपका है – ज़िंदगी आपकी है फैसला आपका है .

The Third Dimension

There are two dimensions in context with leadership traits that are most discussed – what should we say and what should we do. Let us look at one more often overlooked dimension here.

As leaders we do our best to motivate our work force but more often than not we get frustrated of not getting the desired results. We try to sharpen our leadership skills by learning how to talk better, how to show by example, how to train them how to delegate better etc.  All the efforts we make are in the audio-visual mode only. What we overlook, or we are not aware of is the third dimension that is the thinking mode. It is not just the movies that are now in 3D, there is a third dimension to our world too. Read More